एक ऐसी जगह अर्की में जो ध्यान और आध्यात्मिक अनुभव के लिए मानी जाती हैं

Preneeta sharma

हिमाचल प्रदेश के शिमला से लगभग 60 किलोमीटर और अर्की के पास पिपलूघाट से 10 किलोमीटर दूर स्थित, बाड़ी धार या बाड़ी की धार या बड़ादेव वह पवित्र स्थान है जो ध्यान और आध्यात्मिक अनुभव के लिए मानी जाती हैं.

समुद्र के स्तर से 6781 फीट की ऊंचाई पर स्थित शिमला की सुंदर पहाड़ी के ऊपर एक छोटा सा मंदिर बसा है जो की भगवान शिव और वार्षिक मेले के लिए प्रसिद्ध है जो 14/15 जून को आयोजितकिया जाता है।

बडी धार जिला महासू (अब शिमला) का हिस्सा 1972 तक पूर्वी तहसील अर्की (भागल) में था, बाद में जिला सोलन को 1972 में बनाया गया था और यह जिला सोलन में विलय किया गया था। ऐसा कहा जाता है कि पांडवा ने इस जगह पर निर्वासन के कई साल बिताए है।

भगवान शिव को समर्पित मंदिर यहां स्थित है, स्थानीय लोग उसे बड़ादेव कहते हैं और इस शिखर का नाम भी उसके नाम पर है। ऐसा कहा जाता है कि पांडव ने “महाभार्टा” की लड़ाई के बाद इस जगह का दौरा किया, अपने स्वयं के भाइयों की हत्या के अभिशाप को रोकने के लिए। वह भगवान शिव से मोक्ष की तलाश के लिए यहाँ आए थे. कहा जाता है की उन्हे नारड” ने बताया था कि भगवान शिव ध्यान में इस सीमा के चरम पर बैठे हैं। तब सब पांडवो ने उनसे भेंट करने की योजना बनाई. यह भी कहा जाता है की पण्डवास ने आठ दिनों के लिए चोटी के आसपास रहें और नौवें दिन पर वे भगवान शिव से मिलने गए थे. जैसा कि वे पहाड़ पर शिव के शीर्ष पर पहुंचे वैसे ही शिव भुफौ के आकार में कुरुक्षेत्र ko निकल गए और एक “धुनी” छोड़ गए. उसके बाद पांडवो ने यहाँ भगवान शिव को समर्पित मंदिर बनाया और हर साल आसपास के लोगों आठ दिनों के लिए एक साथ यहाँ आते है स्थानीय संगीत उपकरणों के साथ और नौवें दिन वे अपने पांच देवताओं “पांडव” के साथ चोटी पर जाते हैं.स्थानियो का यह भी कहना है की पण्डवास ने इस जगह का दो बार दौरा किया है.

यह भी कहा जाता है बाड़ी धार, बड़ा देव शब्दों से लिया गया है जिसका अर्थ है देवताओं में बड़ा या श्रेष्ठ, लेकिन वास्तविक अर्थ पाण्डवों के बड़े भ्राता धर्मराज युधिष्ठिर से हैं, यूं तो समूचे हिमाचल को पाण्डवों के साथ जोड़ा जाता है और उनके प्रतीक आज भी ज्यों त्यों हैं। लेकिन खेद का विषय यह है कि छोटा राज्य होने के कारण ये उतने प्रसिद्ध नहीं हो पाएं हैं जितने भारत के अन्य स्थान। बाड़ी की धार यहां पाचों पाण्डव विराजतें हैं जो यहां अलग अलग नामों से आज भी पूजे जातें हैं.

स्थानीय निवासी यह भी कहतें हैं कि पहाड़ी की दूसरी तरफ भूतों का साम्रराज्य था वहां पर भूतों के लिए प्रारम्भ में नरबली दी जाती थी जो बाद में पशुबली हो गई बाड़ी की धार में मेला होता है जहां पांचों पाण्डव अपने अपने स्थानों से आकर बाड़ा देव से मिलतें हैं। कहा जाता है यहाँ रात को कोई नहीं रूकता था बाड़ा देव भूतों से लोगों की रक्षा करते थे। एक बार मेले में गया एक आदमी कौतुहलवश की रात को यहां क्या होता होगा एसा सोचकर वहां रूक गया और एक वृक्ष पर चढ़ गया जब अंधेरा घिरने लगा तो वहां भूतों का ताण्डव शुरू होने लगा वो लोगों द्वारा दी गई बलियों का भक्षण करने लगे वो व्यक्ति भयभीत हो गया और चिल्लाने लगा भूत उसको डराने लगे तो उसने बाड़ा देव से प्रार्थना की कि हे देव आप मुझे इस विपत्ति से बचा लें मेरी रक्षा करें उसी समय वह वृक्ष वहां से उखड़ा और दयोथल नामक स्थान पर स्थापित हो गया जो आज भी वहां है। उसके पश्चात वह आसपास के क्षेत्र में विख्यात हो गए । यहां हर साल मेला लगता है जो बाड़ी का मेला के नाम से जाना जाता है। बाड़ा देव आज भी गुरो के माध्यम से लोगों की समस्याओं का निवारण करतें हैं।

यह भी कहा जाता है की जब अंग्रजो ने बाड़ी धार को अपनी राजधानी बनाना चाहा क्योंकि बाड़ी धार की ऊंचाई शिमला जाखू से ढाई मुठी ऊँची थी लेकिन नाकाम रहे क्योंकि बाड़ा देव ने अंग्रजों के मंसूबों पर पानी फेर दिया जैसे ही उन्होंने वहां अपना कार्य आरम्भ किया तो उसी क्षण रिउँगलों ने अंग्रजों पर हमला बोल दिया। वे एक दिन भी वहां नही रुक पाये और सीधे बाड़ी धार के समान मनमोहक स्थान तलाश करने लगे। कहा जाता है की उसके बाद अंग्रेजों ने शिमला को अपनी ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया था।

देव भूमि बाड़ी धार के बाड़ी मेले में जो आता है बाड़ा देव उसकी सभी मन की मुरादें पूरी करतें है यही कारण श्रद्धालु दूर-२ से इस मेले को देखने के लिए यहाँ पहुँचते हैं। इस मेले की पूर्व संध्या पर इस स्थान पर रतजगा अर्थात जागरण का आयोजन होता है। इस मेले में भारी भीड़ होती है। माना जाता है की जितनी भीड़ यहाँ मेले के दिन होती है उससे ज्यादा भीड़ इसकी पूर्व संध्या पर रतजगे वाली रात को होती है। मेले की पूर्व संध्या पर यहाँ कीर्तन भजन होता है। मेले की पूर्व संध्या पर यहां ढोल-नगाड़ों के साथ पूज(पूजा) बाड़ी को रवाना होती है।

हालांकि मेले वाले दिन यहाँ तीन पूजा देखने को मिलती है। पूजा से अभिप्राय यह है की जब पांडवों की मूर्तियाँ बाड़ी क लिए भगवान् शंकर से मिलन करवाने के लिए बाड़ी की ओर से जाती है तो उसके पीछे श्रद्धालु ढोल नगाड़ों की साथ बाड़ी के लिए प्रस्थान करती है। जिसे ‘पूज अथवा पूजा’ के नाम से पुकारा जाता है। यह नाम प्राचीन काल से दिया जा चूका है, रात को केवल दो ही पूजा बाड़ी के लिए प्रस्थान करती है जिसमे पहली बुइला(सरयांज) और दूसरी कुंहर पंचायत देवस्थल(चौंरटु) से जाती है। तीसरी पूजा रात के समय यहाँ पर शामिल नही होती है। कारण यह है की यह पूज लगभग ४-५ घंटे का पैदल रास्ता तय करना पड़ता है जो रात में संभव नही है। इसलिए तीसरी पूज के श्रद्धालु अपना पूर्व संध्या का काम भी मेले वाले दिन ही करते हैं।

मेले के दिन मूर्तियाँ पालकियों द्वारा बाड़ी तक पहुंचाई जाती है। इस मेले में पांड्वो का सम्मान देने के लिए विभिन्न प्रकार की मन को मोहने वाली धुनें बजायी जाती है. जिसे ‘बेल’ कहतें हैं। बाड़ीधार मेले के आठ दिन पहले सभी देवालयों में बेल बजानी शुरू हो जाती है। लोगों की धारणा है की इस मेले में जो भी व्यक्ति सच्चे मन से पुकार करता है उसकी मुराद ज़रूर पूरी होती है। इसलिए प्रतिवर्ष हजारों की तादाद में लोग अपने इष्टदेव बाड़ादेव के दर्शनों के लिए आतें है। यह मेला आषाढ़ मास की सक्रांति को बहुत ही हर्षोउल्लास से मनाया जाता है।

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