तर्कसंगत न्याय नहीं हैदराबाद एनकाउंटर

कुलदीप सुमन, शिमला

भारत एक पुरातन राष्ट्र है। प्राचीन काल से ही धर्म की राह पर चलना इस राष्ट्र का चरित्र रहा है। पूण्य और पाप को परिभाषित करने के लिए अनेको ऋषियों-मुनियों और समाज सुधारकों ने सिद्ध तर्को पर आधारित एक भारतीय दर्शन तैयार किया है। प्राचीन समय से ही पूण्य और पाप दोनों साथ-साथ चलते आए है।

जघन्य अपराध पहले भी होते थे और अब भी होते है। पूण्य करना धार्मिक व्यक्तियों की प्रवृत्ति होती है और पाप करना अधर्मियों की प्रवृति होती है। लेकिन प्राचीन समय में जघन्य अपराधियों को दण्डित करने के लिए जो भी न्याय व्यवस्था रहती थी उसमें जनता की पूरी श्रद्धा और निर्णयों में पूर्ण विश्वास रहता था। न्याय व्यवस्था में श्रद्धा व विश्वास होने के कारण न्याय सर्वस्वीकार्य हुआ करता था। लेकिन वर्तमान में स्थिति बिल्कुल विपरीत है।

अगर हम वर्तमान भारत की बात करें तो जघन्य अपराध बहुत निर्दयता और बर्बरता के साथ बढ़ते ही जा रहें है लेकिन इससे भी बड़ी चिंता का विषय है भारत की जनता का न्याय व्यवस्था से विश्वास टूट जाना। महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार और फिर निर्मम हत्या के कई उदाहरण जैसे निर्भया मामला, कठुआ मामला, शिमला में गुड़िया केस, हाल ही में उन्नाव ऐसे न जाने कितने मामले आए दिन होते रहते है पर कानून व्यवस्था और न्यायपालिका के सन्दर्भ में बात करें तो न तो कानून में कोई कड़ा कदम उठाया गया न ही न्याय पालिका द्वारा कोई ऐसे निर्णय आए जिसमें आम जनता न्याय से सहमत होती।

हाल ही में हैदरावाद में महिला डॉक्टर बलात्कार और हत्या मामला जिसने सम्पूर्ण राष्ट्र की आत्मा को झकझोर कर रख दिया। अमानवीयता, निर्दयता, क्रूरता और बर्बरता की पराकष्ठा पार कर चार असामाजिक तत्वों ने बहुत मूर्खता से महिला डॉक्टर के साथ सामूहिक बलात्कार किया और उसे जला दिया गया। पूरे देश ने एक स्वर में ऐसे अपराधियों के लिए कठोरतम सजा की मांग की और हज़ारो की संख्या में सड़कों पर न्याय की मांग के लिए लोगों की भीड़ भी उमड़ी ऐसा प्रतीत हुआ कि न्याय की मांग के लिए देश भर में एक बड़ा आंदोलन आरम्भ हो गया है।

हत्यारे गिरफ्तार हुए पुलिस ने जांच आरम्भ की लेकिन देश में न्याय की मांग में हो रहे प्रदर्शन, रैलियां नहीं रुकी। क्योंकि देश की जनता तवरित न्याय की मांग कर रही थी।

मामले के चार दोषी जो न्याय प्रक्रिया में पुलिस की कार्यवाही में बाधा डालने और पुलिस पर ही हमला करते हुए मारे गए। उनकी मौत को देशभर में जनता ने एक उत्सव के रूप में मनाया और जाहिर भी है क्योंकि उन्होंने अपराध भी इस योग्य किया था। विचारणीय विषय यह है कि उनकी मौत न्याय की प्रक्रिया में कानूनी कार्यवाही को अवरुद्ध करने के लिए हुई है न कि उनके द्वारा किए गए जघन्य अपराध के लिए दिए गए दंड के रूप में उनकी मौत हुई है।

देश की जनता ने स्वाभाविक रूप से इस अधूरे न्याय को ही न्याय मान लिया। लेकिन मुठभेड़ में किसी अन्य मामले में आरोपियों की मौत को न्याय मानना कभी भी तर्कसंगत न्याय नहीं हो सकता। न्यायपालिका में अब जनता का विश्वास डगमगाने लगा है। मुठभेड़ में आरोपी की मौत उसके अपराध की सजा के रूप देखना बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। ये न्याय अभी अधूरा हैं। ये न्याय तर्कसंगत नहीं है, ये न्याय एकरूपता से देशभर में लागू नहीं किया जा सकता इसलिए देश की जनता को न्यायव्यवस्था को प्रभावी और विश्वसनीय बनाने के लिए आवाज उठानी होगी।

कोई भी संस्था अपने संस्थागत तरीके से कार्य करती है और उसका अपना एक दायरा भी होता है। इसलिए किसी आकस्मिक घटना को संस्था विशेष की उपल्बधि बताकर और उसे न्याय की मूर्ति बताकर उसके दूरगामी परिणाम उचित नहीं होंगे। हमें ऐसा न्याय चाहिए जिसके दायरे में देशभर की प्रत्येक प्रताड़ित महिला को न्याय मिल सके, जिसमें जनता का विश्वास हो, जो न्याय तर्कसंगत हो, जो न्याय सर्वस्वीकार्य हो। यदि देश की जनता ने मुठभेड़ को ही न्याय मान लिया है तो यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि आए दिन होने वाले ऐसे अपराधों में ऐसा न्याय संभव नहीं है। और इस प्रकार का न्याय, न्याय नहीं लेकिन प्रतिशोध होगा। किसी के अपराध करने पर उससे बदला लेना भी एक और अपराध को जन्म देता है। अपराध का बदला अपराध कभी भी न्याय संगत नहीं हो सकता।

न्यायपालिका में आम जनता का तनिक भी विश्वास न रहना इस देश में गंभीर चिंता का विषय है और यह विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र पर भी सवालिया निशान खड़े करता है। सामूहिक बलात्कार एवं निर्मम हत्या जैसे जघन्य अपराधों के आरोपियों के लिए उतनी ही भयानक सजा का प्रावधान होना चाहिए जितना भयानक उन्होंने अपराध किया है।

लेकिन मुठभेड़ में अपराधियों की मौत न्याय का स्थान ले सकती है क्या? आज देश की न्याय व्यवस्था को जनहित के अनुरूप बनाने की आवश्यकता है ताकि देश को न्याय पालिका में विश्वास रहें अन्यथा प्रतिशोध ही न्याय का स्थान ले लेगा और व्यक्ति अपने स्तर पर न्याय करना आरंभ कर देंगे जिससे देश मे बहुत तीब्र गति से अराजकता और अपराध बढ़ेंगे।

Please follow and like us:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *