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  • मकर संक्रांति पर सूर्य व शनि का साथ सत्ता के बड़े नेताओं पर भारी : पंडित शशिपाल डोगरा

    मकर संक्रांति पर सूर्य व शनि का साथ सत्ता के बड़े नेताओं पर भारी : पंडित शशिपाल डोगरा

    शिमला,12जनवरी

    मकर संक्रांति पर इस साल लोग दो तिथियों को लेकर असमंजस में हैं। अपने संशय को दूर करने के लिए यह जान लें कि मकर संक्रांति तब शुरू होती है जब सूर्य देव राशि परिवर्तन कर मकर राशि में पहुंचते हैं। इस बार सूर्य देव 14 जनवरी की दोपहर 2:27 बजे पर गोचर कर रहें हैं‌।

    वशिष्ठ ज्योतिष सदन के अध्यक्ष पंडित शशिपाल डोगरा के अनुसार इस मकर संक्राति पिता (सूर्य) का पुत्र (शनि) के घर में आना राजनीतिक क्षेत्र में काफी उथल-पुथल मचाएगा। सूर्य और शनि एक साथ जब भी आए हैं देश की राजनीतिक हलचल को ही बढ़ाया है। सूर्य देव का शनि देव के साथ होना देश के राजनेताओं के लिए भारी पड़ता दिख रहा है।

    इन दो ग्रहों का एक साथ आना राष्ट्रीय स्तर पर फेरबदल के योग बना रहा है। इसके साथ साथ किसी बड़े नेता के लिए श्मशान योग भी बना रहा है। पंडित डोगरा ने बताया कि सूर्यास्त से पहले यदि मकर राशि में सूर्य प्रवेश करते हैं तो इसी दिन पुण्यकाल रहेगा। 16 घटी पहले और 16 घटी बाद का पुण्यकाल विशेष महत्व रखता है।

    पंडित डोगरा के अनुसार मकर संक्रांति का पुण्यकाल मुहूर्त सूर्य के संक्रांति समय से 16 घटी पहले और 16 घटी बाद का पुण्यकाल होता है। इस बार पुण्यकाल 14 जनवरी को सुबह 7:15 बजे से शुरू हो जाएगा, जो शाम को 5:44 बजे तक रहेगा। ऐसे में मकर संक्रांति 14 जनवरी को ही मनाया जाएगा। इस दिन स्नान, दान, जाप कर सकते हैं। वहीं स्थिर लग्न यानि महापुण्य काल मुहूर्त की बता करें तो यह मुहूर्त 9:00 बजे से 10:30 बजे तक रहेगा।

    पंडित डोगरा ने बताया कि शुक्रवार 14 जनवरी को मकर संक्रांति है। सूर्य के उत्तरायण का दिन। शुभ कार्यों की शुरूआत। इस दिन नदियों में स्नान और दान का बहुत महत्व बताया गया है। इस दिन से देश में दिन बड़े और रातें छोटी हो जाती हैं। शीत ऋतु का प्रभाव कम होने लगता है। मकर संक्रांति का पौराणिक महत्व भी खूब है। मान्यता है कि सूर्य अपने पुत्र शनि के घर जाते हैं। भगवान विष्णु ने असुरों का संहार भी इसी दिन किया था। महाभारत युद्ध में भीष्म पितामह ने प्राण त्यागने के लिए सूर्य के उत्तरायण होने तक प्रतीक्षा की थी।

    जानिए इस त्यौहार पर खिचड़ी की महत्ता बारे

    इस दिन गुड़, घी, नमक और तिल के अलावा काली उड़द की दाल और चावल को दान करने का विशेष महत्व है। घर में भी भोजन के दौरान उड़द की दाल की खिचड़ी बनाकर खाई जाती है। तमाम लोग खिचड़ी के स्टॉल लगाकर उसका वितरण करके पुण्य कमाते हैं। इस कारण तमाम जगहों पर इस त्यौहार को भी खिचड़ी के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि इससे सूर्यदेव और शनिदेव दोनों की कृपा प्राप्त होती है।

    ये कथा है प्रचलित

    कहा जाता है कि मकर संक्रान्ति के दिन खिचड़ी बनाने की प्रथा बाबा गोरखनाथ के समय से शुरू हुई थी। बताया जाता है कि जब खिलजी ने आक्रमण किया था, तब नाथ योगियों को युद्ध के दौरान भोजन बनाने का समय नहीं मिलता था और वे भूखे ही लड़ाई के लिए निकल जाते थे। उस समय बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और सब्जियों को एक साथ पकाने की सलाह दी थी। ये झटपट तैयार हो जाती थी।

    इससे योगियों का पेट भी भर जाता था और ये काफी पौष्टिक भी होती थी। बाबा गोरखनाथ ने इस व्यंजन का नाम खिचड़ी रखा। खिलजी से मुक्त होने के बाद मकर संक्रान्ति के दिन योगियों ने उत्सव मनाया और उस दिन खिचड़ी का वितरण किया। तब से ​मकर संक्रान्ति पर खिचड़ी बनाने की प्रथा की शुरूआत हो गई।

    मकर संक्रान्ति के मौके पर गोरखपुर के बाबा गोरखनाथ मंदिर में खिचड़ी मेला भी लगता है। इस दिन बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी का भोग लगाया जाता है और लोगों में इसे प्रसाद रूप में वितरित किया जाता है।

  • हिमाचल में मकर संक्रांति पर यहां नहाने से शनि देव की कृपा बनी रहती है, जानिए कहाँ

    हिमाचल में मकर संक्रांति पर यहां नहाने से शनि देव की कृपा बनी रहती है, जानिए कहाँ

    Preneeta Sharma

    अगर आपपे शनि भारी या आपके काम नहीं बन पा रहे है तो आइए हिमाचल प्रदेश के इस जगह पर जहाँ मकर सक्रांति के दिन स्नान करने पर आप शनि देव खुश हो जाते है ।

    बता दे 14 जनवरी को मकर संक्रांति है और तत्तापानी में इसे मनाने का अपना ही विशेष महत्व है। तत्तापानी को ऋषि जमदगनी की तपोस्थली माना जाता है। यहां पर  मकर संक्रांति पर हजारों की संख्या में लोग डुबकी लगाते है । यहां मकर संक्रांति पर तीन दिनों तक धार्मिक आयोजन किया  हैं । यहां सिर्फ हिमाचल नहीं, दूसरे राज्यों से भी लोग पहुंचते हैं। माना जाता है कि मकर संक्रांति पर यहां नहाने से तमाम तरह के चर्म रोग दूर हो जाते हैं। वहीं, श्रद्धालु अपने ग्रहों के दोष दूर करने तुलादान भी करते हैं। यहां सतलुज नदी बहती है।

    तत्तापानी में पहले बड़ी संख्या में गर्म पानी के चश्मे(गड्ढे) हुआ करते थे। इनमें स्नान करने से चर्म रोग दूर होते थे। हालांकि अब गर्म चश्मे नहीं बचे हैं, लेकिन मान्यता बरकरार है। श्रद्धालुओं के लिए प्रशासन ने कृत्रिम तौर पर चश्मे बनवाए हैं।

    माना यह भी जाता है कि इस पानी में नहाने से मन को सुकून मिलता है। यहां पूरे माघ महीने में तुलादान और स्नान परंपरा है। यहां लोग अपनी श्रद्धा के अनुसार चीजों से तुलते हैं और उसे दान करते हैं।

    बुजुर्गो के द्वारा  कहा जाता है कि यहां सप्त ऋषियों में शामिल जमदगनी ने कई सालों तक घोर तपस्या की थी। इसी पर उन्हें भगवान ने वरदान दिया था कि जो भी व्यक्ति यहां के गर्म चश्मे में स्नान करेगा, उसके चर्म रोग दूर हो जाएंगे और शनि भी उन्हें परेशान नहीं करेगा।