एक डॉक्टर केवल बीमारी देखता है। वह डायग्नोसिस करता है, दवा लिखता है और आगे बढ़ जाता है। उसके लिए मरीज एक “केस” होता है –एक नंबर, एक फ़ाइल। उसकी आवाज़ में ठंडक होती है, नज़रें घड़ी पर टिकी रहती हैं, और शब्दों में जल्दबाज़ी। वह सही हो सकता है, कुशल हो सकता है, लेकिन उसका इलाज सिर्फ़ शरीर तक पहुँचता है – दिल तक नहीं। मरीज उसके पास से उठता है तो शरीर में दवा तो होती है, लेकिन दिल में एक खालीपन, एक ठेस।
लेकिन एक अच्छा डॉक्टर इंसान देखता है। वह मरीज के चेहरे पर दर्द पढ़ता है, उसकी आँखों में डर को पहचानता है। वह धीरे से हाथ थामता है, मुस्कुराकर कहता है।
“चिंता मत कीजिए, मैं हूँ ना आपके साथ। सब ठीक हो जाएगा।” वह मरीज का नाम लेकर पुकारता है, उसकी बात पूरी सुनता है, और जवाब में प्रेमपूर्वक समझाता है जैसे कोई अपना समझा रहा हो। उसकी आवाज़ में करुणा होती है, व्यवहार में सम्मान,वह जानता है कि दवा के साथ-साथ आशा एक दवा है,और वो आशा वह स्वयं होता है। मरीज उसके पास से उठता है तो दिल में एक नई रोशनी लेकर, एक नई हिम्मत लेकर।
अच्छा डॉक्टर समझता है कि अस्पताल सिर्फ़ ईंट-पत्थर का ढाँचा नहीं, बल्कि पीड़ित मानवता का आश्रय स्थल है जहाँ हर आंसू को पोंछा जाना चाहिए, हर डर को गले लगाया जाना चाहिए। वहाँ हर शब्द एक घाव भर सकता है या नया घाव दे सकता है।
आज का शिक्षित और जागरूक समाज यही माँग कर रहा है कि हमारे अस्पतालों में सिर्फ़ मशीनें और दवाइयाँ नहीं, बल्कि संवेदनशील दिल और सम्मानजनक शब्द भी हों। यह समय है आत्ममंथन का, सुधार का क्योंकि जब तक स्वास्थ्यकर्मी एक-दूसरे के और मरीजों के प्रति करुणा नहीं दिखाएँगे, तब तक सच्चा उपचार पूर्ण रुप से परिभाषित नहीं हो सकेगा।
आइए, हम सब मिलकर अस्पतालों को फिर उस मुकाम पर ले जाएँ जहाँ इंसान सिर्फ़ स्वस्त होने नहीं, बल्कि सम्मानित, आस्वस्त एवम् सुरक्षित महसूस करे…क्योंकि अन्ततः इलाज सिर्फ़ शरीर का नहीं, मन का भी है…इंसानियत और करुणा जिसकी सच्ची दवा है।







