यह कैसा व्यवस्था परिवर्तन, सरकार आरोपियों को कर रही पुरस्कृत
सरकार न्याय की नहीं बदले की भावना से कर रही है कार्रवाई
शिमला: शिमला से जारी बयान में वन निगम के पूर्व अध्यक्ष एवं किन्नौर से भाजपा प्रत्याशी सूरत नेगी ने कहा है कि प्रदेश में व्यवस्था परिवर्तन की ऐसी सरकार चल रही है जो किसी ईमानदार अधिकारी की मौत पर न्याय मांगने वालों को तो दंडित करती है लेकिन उनकी मौत के जो जिम्मेदार हैं उन्हें पुरस्कृत करती है। विमल नेगी 10 फरवरी को अचानक लापता हो जाते हैं और 18 फरवरी को उनकी लाश मिलती है। उनके परिजन आईएएस अधिकारी हरिकेश मीणा, शिवम प्रताप सिंह और देशराज पर उन्हें प्रताड़ित करने का आरोप लगाते हैं। भारतीय जनता पार्टी और जनता के भारी दबाव के बाद सरकार इन अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करती है और इन्हें पावर कॉरपोरेशन से हटा देती है।
आरोपित अधिकारियों पर कार्रवाई करना सिर्फ एक दिखावा था जिसकी कलई बहुत जल्द खुल गई। सबसे पहले सरकार ने इन सभी आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया, जब देशराज की जमानत याचिका हाई कोर्ट से खारिज हुई तो सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने अपना पक्ष रखने के लिए कोई वकील ही नहीं नियुक्त किया। जिससे उसे अग्रिम जमानत मिल गई। आज की तारीख में विमल नेगी की मौत के सभी आरोपित फिर से बहाल कर दिए गए हैं। उन्हें प्रमुख जगहों पर पोस्टिंग दी गई है। उन सभी आरोपियों पर न सिर्फ गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज हैं बल्कि सहयोगियों द्वारा भी उन पर बहुत गंभीर आरोप लगाए गए हैं। दूसरी तरफ विमल नेगी की मौत के मामले में न्याय की मांग करने वाले लोग अभी भी सरकार द्वारा प्रताड़ित किए जा रहे हैं। जिस प्रकार से एसीएस रैंक के अधिकारी द्वारा सरकार के मन माफिक रिपोर्ट न बनने पर उनसे तमाम विभाग छीनकर उनका अपमान किया गया इसी तरीके से विमल नेगी की मौत की जांच के लिए सड़कों पर उतरने वाले बिजली कर्मचारी और इंजीनियर एसोसियेशन के पदाधिकारियों के खिलाफ बदले की भावना से कार्रवाई की जा रही है। अपराधिक प्रवृत्ति के आरोप झेल रहे अधिकारियों को पुरस्कृत करने और विमल नेगी के लिए इंसाफ की मांग करने वाले अधिकारियों को दंडित करने वाली सरकार का मुखौटा अब उतर चुका है।
सूरत नेगी ने कहा कि सरकार की नीयत में पहले दिन से ही खोट था। इस मामले की जांच के लिए सरकार पुलिस और एसीएस रैंक के अधिकारी को अलग-अलग जांच का जिम्मा सौंपती है। जांच में क्या-क्या हुआ यह पूरी दुनिया ने देखा। सरकार की तरफ से सबूत जुटाने के लिए बनाई गई एसआईटी सबूत मिटाने में ही मशगूल रही। डीजीपी और एसपी एक दूसरे पर आरोप लगाते रहे। पुलिस का पूरा ध्यान इस पर था कि मामले की जांच सीबीआई न कर सके। इस पूरे प्रकरण में प्रदेश की संस्थाओं से लोगों के भरोसे में कमी आई। देखते हुए माननीय न्यायालय ने इस मामले की सीबीआई जांच के आदेश दिए। यह भी कहा कि इस जांच में हिमाचल प्रदेश से संबंध रखने वाला एक भी अधिकारी शामिल नहीं किया जाएगा। दूसरी तरफ एसीएस रैंक के अधिकारी की जांच रिपोर्ट रिपोर्ट आने के बाद भी मुख्यमंत्री ने महीनों उस रिपोर्ट को देखा भी नहीं और न ही उसे सार्वजनिक किया। माननीय न्यायालय के द्वारा आदेश के जरिए ही उस रिपोर्ट को सार्वजनिक किया गया। मामले में सीबीआई जांच की इच्छा रखने वाले पूर्व डीजीपी को भी इस सरकार ने नहीं बख्शा और एक डीजीपी के तौर पर उनका विदाई समारोह तक नहीं किया। यही नहीं पूर्व डीजीपी द्वारा पुलिस कर्मियों को दिए गए अवार्ड को भी सरकार ने रद्द कर दिया। बदले की भावना से की गई कार्रवाई के ऐसे उदाहरण हिमाचल के इतिहास में कभी नहीं देखे गए।







