बिलासपुर:
हिमाचल प्रदेश अपनी समृद्ध और अलग पहचान वाले लोकसंस्कृति, देव परंपरा और मेलों के लिए जाना जाता है। लेकिन अब राज्य के पारंपरिक आयोजनों में दूसरे राज्यों की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं की नकल किए जाने को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
बिलासपुर में आयोजित होने वाले राज्य स्तरीय नलवाड़ी मेले में इस बार पहली बार “सतलुज आरती” करवाने की तैयारी की जा रही है। बताया जा रहा है कि यह आरती बनारस की गंगा आरती की तर्ज पर गोविंदसागर झील के घाटों पर आयोजित की जाएगी। जिला प्रशासन इसे मेले का नया आकर्षण बता रहा है और इसके लिए विशेष सजावट और कार्यक्रम की योजना बनाई जा रही है।
हालांकि इस निर्णय को लेकर स्थानीय लोगों और सांस्कृतिक जानकारों के बीच चर्चा शुरू हो गई है। कई लोगों का मानना है कि हिमाचल की अपनी अलग देव संस्कृति, नाटी, स्थानीय मेले और धार्मिक परंपराएं हैं, जिन्हें मजबूत करने की जरूरत है। ऐसे में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की परंपराओं की नकल करने से हिमाचल की मूल पहचान कमजोर हो सकती है।
सांस्कृतिक विशेषज्ञों का कहना है कि गंगा आरती वाराणसी और हरिद्वार जैसे स्थानों की ऐतिहासिक धार्मिक परंपरा का हिस्सा है, जबकि हिमाचल में सदियों से देव परंपरा, देव यात्रा और स्थानीय देवी-देवताओं से जुड़े अनुष्ठान प्रमुख रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर दूसरे राज्यों की धार्मिक परंपराओं की नकल करना उचित है।
नलवाड़ी मेला हिमाचल के सबसे पुराने और ऐतिहासिक मेलों में से एक माना जाता है, जहां पशु मेले, सांस्कृतिक कार्यक्रम और पारंपरिक गतिविधियां इसकी पहचान रही हैं। लेकिन अब इस मेले में बाहरी शैली के धार्मिक कार्यक्रम जोड़ने को लेकर बहस तेज हो गई है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि सरकार और प्रशासन वास्तव में पर्यटन और संस्कृति को बढ़ावा देना चाहते हैं, तो उन्हें हिमाचल की मूल लोक परंपराओं, देव संस्कृति और पहाड़ी पहचान को आगे लाने पर ध्यान देना चाहिए, न कि दूसरे राज्यों की परंपराओं की नकल पर।
नलवाड़ी मेला महत्व
राजाओं के समय से बिलासपुर में चला आ रहा नलवाड़ी पशु मेला आज भी उसी उत्साह के साथ मनाया जाता है, लेकिन समय की धारा के साथ मेले का अस्तित्व लगातार बदलता चला गया. एक समय में अच्छी नस्ल के पशुओं की खरीददारी के रूप में आयोजित नलवाड़ी पशु मेला होता था । राज्यस्तरीय नलवाड़ी मेले में पशु प्रतियोगिता, कुश्ती व खेलकूद प्रतियोगिता सहित सांस्कृतिक संध्याऐं ही लोगों के लिए आकर्षण का मुख्य केंद्र है। प्राचीनतम संस्कृति में शुमार नलवाड़ी मेला राजाओं के समय से मनाते चले आ रहे हैं और इस मेले के सफल आयोजन के लिए प्रदेश के लोगों को चाहिए कि वह लुहनु मेला ग्राउंड का रुख करें ताकि मेले के रूप में जहां प्राचीन संस्कृति को संजोये रखा जा सके तो साथ आज की युवा पीढ़ी भी इन मेलों के जरिए अपनी संस्कृति व भाईचारे को समझ सके.



