निःसंतान दंपतियों की सूनी गोद भरती है जैईश्वरी माता
शिमला, 18 अक्तूबर। हिमाचल प्रदेश के प्राचीन मंदिरों की श्रृखला में शुमार धरेच के केलियाघाट में जैईश्वरी माता का आठ दिवसीय मेले रविवार को पारंपरिक श्रद्धा और उल्लास के साथ आरंभ हुए । दुर्गाष्टमी (आठयो) के पावन अवसर पर माता के प्राचीन मंदिर धरेच से पारंपरिक वाद्य यंत्रों की जयघोष के बीच भव्य शोभायात्रा निकाली गई। शोभायात्रा केलिया घाट स्थित माता के प्राचीन मंदिर में पहुंचकर संपन्न हुई। इसमें क्षेत्र के सैकड़ों श्रद्धालुओं ने भाग लेकर माता का आशीर्वाद प्राप्त किया।
देवी के वजीर खानदान से संबंधित हरिचंद शर्मा ने बताया कि परंपरा के अनुसार केलिया घाट स्थित मंदिर में प्रतिवर्ष शरद नवरात्र की दुर्गाष्टमी से शरद पूर्णिमा तक धार्मिक मेले का आयोजन किया जाता है। दुर्गाष्टमी के दिन जैईश्वरी माता धरेच से केलिया घाट स्थित प्राचीन मंदिर मौड़ में विराजमान होती हैं। यहां माता चतुर्दशी तक श्रद्धालुओं को दर्शन देती हैं, जबकि शरद पूर्णिमा के अवसर पर वह वापस अपने मूल मंदिर धरेच में प्रवेश करती हैं।
उन्होने बताया कि इस मेले की विशेषता यह है कि यहां किसी प्रकार की अन्य मनोरंजक गतिविधियों के बजाय देवी के दर्शन और पूजा-अर्चना को ही प्राथमिकता दी जाती है। माता के प्रति गहरी आस्था के चलते क्षेत्र के अलावा दूरदराज से भी श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मेले के दौरान बड़ी संख्या में लोग अपने छोटे बच्चों का मुंडन संस्कार करवाने भी आते हैं।
हरिचंद शर्मा ने बताया कि जैईश्वरी नगरकोटी माता के प्रति श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है। विशेष रूप से निःसंतान दंपतियों की माता सूनी गोद भरती है जिसके चलते हर वर्ष असंख्य दंपति मनोकामना पूर्ण होने पर मंदिर में पहूंचते है। कंुछ श्रद्धालु माता के दरबार में संतान प्राप्ति की कामना करने पहुंचते हैं। मंदिर में चावल के दाने प्रसाद के रूप में दिए जाते हैं, जिन्हें श्रद्धालु श्रद्धापूर्वक अपने घरों में सहेजकर रखते हैं।
माता के केलिया घाट पहुंचने के बाद मंदिर में सात जागरों की परंपरा निभाई जाती है। इनमें एक जागरा मंदिर समिति की ओर से आयोजित किया जाता है, जबकि छह जागरे बगोल, धारठी, सौंथल, रिहाड़, बटनाली और खगनाल गांवों की ओर से दिए जाते हैं। पहले ये जागरे संबंधित गांवों में आयोजित किए जाते थे, लेकिन अब इन्हें क्रमवार केलिया घाट में श्रद्धालुओं के लिए आयोजित किया जाता है।
उन्होंने बताया कि अतीत में मंदिर में बलि प्रथा प्रचलित थी, जिसे वजीर मोती राम शर्मा ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश आने से पहले ही बंद करवा दिया था। मंदिर समिति की ओर से मेले में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए स्थानीय स्तर पर आवश्यक प्रबंध किए गए हैं।


