शिमला जिला के क्योंथल और सीमा पर लगते सिरमौर जिला के अनेक क्षेत्रों में कालांतर से मक्की का विभिन्न प्रकार से प्रयोग किया जाता रहा है। ग्रामीण परिवेश में हरी मक्की के पचौले और सतू तैयार करने का अतीत से काफी प्रचलन है ।
हरी मक्की से तैयार पचौले एक पहाड़ी व्यंजन है जोकि स्वादिष्ट ही नही अपितु अनेक खनिज तत्वों से भी भरपूर है । हरी मक्की को प्रायः भूटटे के तौर पर बड़े शौक के साथ खाई जाती है और यदि इसके साथ अखरोट का मिश्रण किया जाए तो इसका स्वाद दुगना हो जाता है । चिकित्कों के अनुसार मक्की के सेवन से शरीर में बी12 की कमी पूरी होती है ।
ट्रहाई गांव के प्रीतम ठाकुर व इंदिरा ठाकुर ने पचौले के बारे बताया कि पचौले तैयार करने के लिए हरी मक्की को छिलकर उसको ग्राईडर मशीन में पीसकर पेस्ट बनाया जाता है जबकि अतीत में मक्की को हाथ से सील बटटे पर पीसकर पेस्ट तैयार किेया जाता था । पचौले प्रायःदो प्रकार अर्थात मीठे और नमकीन बनाए जाते है । मीठे पचौले में गुड़ अथवा शक्कर के अतिरिक्त मीठी सौप, गरी इत्यादि का मिश्रण डाला जाता है जबकि नमकीन पचौले में आवश्यतानुसार नमक व अन्य मसाले मिलाए जाते है । पचौलों को अक्सर घी अथवा दही के साथ बड़े चाव के साथ खाया जाता है । पूर्व प्रधान कुश्ल तोमर ने बताया अतीत में अनाज की कमी होने पर उनके बुजुर्ग खेतों से हरी मक्की तोड़कर लाते थे जिसके पचौले अथवा डणे बनाकर परिवार को खिलाते थे । इसके अतिरिक्त लोग कच्ची मक्की को उबालकर उसके पीसकर सत्तू भी बनाते है जिसे विशेषकर गर्मियों के मौसम मे लस्सी के साथ खेत में काम करने के दौरान खाते हैं।
आयुर्वेद चिकित्सक डॉ0 विवेक कंवर के अनुसार मक्का में फाईबर काफी मात्रा में उपलब्ध होता है जिसके उपयोग से शरीर में कॉलेस्ट्रॉल स्तर को सामान्य बनने के अतिरिक्त हृदय संबधी रोगों से भी बचाव रहता है । मक्का के दैनिक जीवन में उपयोग से मनुष्य के शरीर में आयरन की कमी भी पूरी होती है अर्थात मक्की की रोटी मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए बहुत ही लाभदायक है । कालांतर से ग्रामीण क्षेत्रों में मक्की का उपयोग भिन्न भिन्न तरीके से काफी मात्रा में किया जाता रहा है परन्तु वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मक्की की रोटी और साग लोगों की बहुत बड़ी पसंद बन गई है ।








