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शनोल पर्व पर क्योंथल क्षेत्र में पारंपरिक व्यंजनों की धूम

सिड्डू और शनोल बनाकर मनाया गया हरियाली उत्सव, कुल देवताओं का लिया आशीर्वाद
शिमला 04 अगस्त। क्योंथल क्षेत्र में श्रावण मास के पावन अवसर पर मनाया जाने वाला पारंपरिक शनोल (हरियाली) पर्व इस वर्ष भी पूरे उत्साह, श्रद्धा और सांस्कृतिक रंगों के साथ मनाया गया। क्षेत्र के लोगों ने अपने घरों में पारंपरिक व्यंजन तैयार कर पर्व की खुशियां साझा कीं। विशेष रूप से मीठे और नमकीन सिड्डू बनाकर परिजनों, रिश्तेदारों और पड़ोसियों में वितरित किए गए। पर्व के अवसर पर लोगों ने अपने कुल इष्ट एवं देवी-देवताओं के मंदिरों में जाकर पूजा-अर्चना की तथा परिवार और क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना की। बरसात के सुहावने मौसम में घी और दही के साथ सिड्डू का स्वाद लेने का आनंद बढ़ गया ।
शनोल पर्व क्योंथल क्षेत्र की समृद्ध लोक संस्कृति और परंपराओं का प्रतीक माना जाता है। श्रावण मास के 20 प्रविष्ठे को मनाया जाने वाला यह पर्व शिमला के क्योंथल क्षेत्र के साथ-साथ सिरमौर और सोलन के सीमावर्ती क्षेत्रों में भी विशेष श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। मान्यता है कि हिमाचल प्रदेश के निर्माता एवं प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. यशवंत सिंह परमार का जन्म भी इसी शुभ पर्व के दिन हुआ था, जिसके कारण इसका महत्व और बढ़ जाता है।
अतीत में शनोल पर्व के अवसर पर कई गांवों में मेलों और पारंपरिक कुश्ती प्रतियोगिताओं का आयोजन होता था। पीरन के दूड़मूं तथा ट्रहाई गांव के कोट में भी कुश्ती दंगल आयोजित किए जाते थे, हालांकि बदलते समय के साथ ये परंपराएं धीरे-धीरे समाप्त हो गई हैं। वहीं नेई-नेटी क्षेत्र में शनोल मेले की परंपरा आज भी जीवित है ।
क्षेत्र के वरिष्ठ नागरिक दया राम वर्मा और दौलत राम मेहता  ने बताया कि शनोल पर्व पर पारंपरिक व्यंजन बनाने और देव पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन महिलाएं हरे रंग की चूड़ियां  पहनती है और मेहंदी लगाती हैं, परिवार एकत्रित होते हैं और लोग अपने कुल देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। शनोल केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि पहाड़ की सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक एकता और लोक परंपराओं को संजोए रखने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है, जिसे आज भी लोग पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं।

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