आधुनिक एवं वैज्ञानिक तकनीकों से बढ़ाएं सेब उत्पादन-डॉ0 सतीश शर्मा
शिमला 19 मार्च । हिमाचल प्रदेश के विभिन्न ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सेब की फसल इस समय फूल अवस्था (ब्लूमिंग स्टेज) में प्रवेश कर रही है, जो संपूर्ण उत्पादन चक्र का अत्यंत संवेदनशील एवं निर्णायक चरण माना जाता है। इस अवधि में परागण, फल सेट तथा प्रारम्भिक फल विकास की प्रक्रियाएं होती हैं, जो आगे चलकर उत्पादन, फल के आकार, गुणवत्ता एवं बाजार मूल्य को सीधे प्रभावित करती हैं। जिसके लिए समय रहते वैज्ञानिक प्रबंधन एवं सावधानी अत्यंत आवश्यक है।
उद्यान विभाग के बागवानी विशेषज्ञ ने विशेष बातचीत में बताया कि वर्तमान मौसम परिस्थितियों में कई क्षेत्रों में कम तापमान, लगातार वर्षा, बादल छाए रहना तथा मधुमक्खियों की कम सक्रियता के कारण प्राकृतिक परागण प्रभावित होने की संभावना बनी हुई है। ऐसे में बागवानों को फल सेट सुनिश्चित करने के लिए हैंड पॉलिनेशन (हस्त परागण) तकनीक अपनाने की सलाह दी जाती है, जो वैज्ञानिक रूप से सिद्ध एवं प्रभावी उपाय है।
इनका कहना है कि हस्त परागण के लिए उपयुक्त एवं संगत परागण किस्मों का चयन अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके लिए गोल्डन डिलीशियस, रेड गोल्डन, ग्रेनी स्मिथ, चौलेंजर, स्नोड्रिफ्ट तथा मंचूरियन जैसी किस्मों का प्रयोग किया जा सकता है । इसके पश्चात पुष्पों से परागकोष अलग कर उन्हें स्वच्छ एवं छायादार स्थान पर 20 से 25 डिग्री सैं0 तापमान पर 24 से 48 घंटे तक सुखाया जाता है, जिससे पराग स्वतः निकल आता है। प्राप्त पराग को छानकर साफ किया जाता है तथा आवश्यकतानुसार ठंडे एवं शुष्क स्थान (रेफ्रिजरेटर) में सुरक्षित रखा जा सकता है। हैंड पॉलिनेशन का कार्य पूर्ण पुष्प अवस्था में किया जाना चाहिए, जब फूल का वर्तिकाग्र चिपचिपा एवं पराग ग्रहण करने के लिए उपयुक्त होता है। परागण के लिए बागवान ब्रश, कॉटन स्वैब अथवा विशेष पोलन एप्लीकेटर का उपयोग कर सकते हैं।
बागवानी विशेषज्ञों ने बताया कि हस्त परागण के साथ-साथ प्राकृतिक परागण को बढ़ावा देना भी अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए बागीचों में पर्याप्त संख्या में मधुमक्खी बक्सों की स्थापना की जानी चाहिए। सामान्यतः 5-8 मधुमक्खी बक्से प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होते हैं। बागवान अपनी आवश्यकता अनुसार मधुमक्खी बक्से बागवानी विभाग के मधुमक्खी पालन (एपिकल्चर) अधिकारियों से प्राप्त कर सकते हैं। मधुमक्खियों की सक्रियता से परागण की गुणवत्ता एवं फल सेट में उल्लेखनीय सुधार होता है।
निदेशक उद्यान विभाग डॉ0 सतीश शर्मा ने बागवानों को यह भी सलाह दी कि इस अवधि में अनावश्यक कीटनाशकों का प्रयोग न करें, ताकि मधुमक्खियों एवं अन्य परागण कीटों की गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। इसके अतिरिक्त सिंचाई, पोषण एवं रोग-कीट प्रबंधन भी वैज्ञानिक सलाह के अनुसार ही किया जाए। उन्होने प्रदेश के समस्त बागवानों से अपील की है कि वे आधुनिक एवं वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाकर सेब उत्पादन को बढ़ाएं। अधिक जानकारी के लिए अपने निकटतम उद्यान विभाग के कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं ।



