विकास की दिशा तय करने से पहले पहाड़ों की वहन क्षमता का आकलन जरूरी – डॉ. डी. रघुनन्दन
शिमला 23 अगस्त । हिमालयी क्षेत्र अपनी भौगोलिक और भूगर्भीय परिस्थितियों के कारण विशेष रूप से संवेदनशील है, इसलिए यहां जलवायु परिवर्तन के प्रभाव कहीं अधिक गंभीर हो सकते हैं। यह विचार हिमाचल ज्ञान विज्ञान समिति के सौजन्य से आयोजित एक कार्यक्रम में प्रसिद्ध वैज्ञानिक, जलवायु परिवर्तन विशेषज्ञ एवं अखिल भारतीय जन विज्ञान नेटवर्क के पूर्व अध्यक्ष डॉ. डी. रघुनन्दन ने व्यक्त किए । उन्होने कहा कि कहा कि पिछले कुछ दशकों में बढ़ते वैश्विक तापमान ने दुनिया और भारत में अत्यधिक वर्षा, अनियमित मानसून, हीट वेव तथा अन्य चरम मौसमी घटनाओं की तीव्रता और जोखिम को बढ़ाया है।
उन्होने कहा कि हिमाचल जैसे हिमालयी राज्यों में जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ अनियोजित और अवैज्ञानिक विकास ने भी आपदा जोखिम को बढ़ाया है। फोरलेन सड़कों, बड़े निर्माण कार्यों और अन्य परियोजनाओं में पहाड़ों की भूगर्भीय संरचना, ढलानों की स्थिरता, जल निकासी और स्थानीय पारिस्थितिकी की अनदेखी से भूस्खलन तथा भू-दृश्य में बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी शहर, पर्यटन क्षेत्र अथवा संवेदनशील पहाड़ी इलाके में बड़े पैमाने पर निर्माण और विकास की अनुमति देने से पहले उसकी वहन क्षमता का वैज्ञानिक आकलन किया जाना चाहिए।
भारत ज्ञान विज्ञान समिति के महासचिव् डॉ. ओ.पी. भुरैटा ने कहा कि हिमालयी राज्यों में विकास का दबाव कई क्षेत्रों में ऐसी सीमा तक पहुंच चुका है जहां पर्यावरणीय क्षति की भरपाई अत्यंत कठिन होती जा रही है। उन्होंने कहा कि हिमाचल में पर्यटन भी स्थानीय संसाधनों और वहन क्षमता के अनुरूप नियोजित एवं नियंत्रित होना चाहिए।
हिमाचल ज्ञान विज्ञान समिति के राज्य सचिव सत्यवान पुंडीर ने कहा कि समिति लंबे समय से पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं के विषयों पर अध्ययन, जन-जागरूकता तथा जनभागीदारी के माध्यम से कार्य कर रही है।
उन्होंने बताया कि देशभर के साथ हिमाचल प्रदेश में भी एक वर्ष तक चलने वाला “फ्यूचर ऑफ इंडिया” अभियान शुरू किया जा रहा है। अभियान के अंतर्गत पर्यावरण, स्वास्थ्य, आत्मनिर्भरता, कृषि और आजीविका जैसे प्रमुख विषयों पर गांव स्तर पर अध्ययन किए जाएंगे। ग्राम पंचायत स्तर पर लोगों के साथ संवाद कर उनके अनुभव, समस्याएं और सुझाव दर्ज किए जाएंगे।











