कुरूड़ स्थापना के साथ संपन हुआ डोम देवता का शांद महायज्ञ

कूंथल -पशोग में बीते दो दिन से चल रहा शांद महायज्ञ कुरूड़ स्थापना के साथ संपन हो गया । इस दो दिवसीय महायज्ञ में परघेल व रासूमांदर तथा सीमा पर लगते शिमला जिला के अनेक क्षेत्रों से आए हजारों लोगों ने डोम देवता का प्रसाद व आर्शिवाद प्राप्त किया ।
जाने माने साहित्यकार एवं देवठी मझगांव के पूर्व प्रधान विद्यानंद सरैक ने बताया कि बीते शुक्रवार को क्षेत्र के लोगों द्वारा देवदार का समूचा छिला हुआ वृक्ष अर्थात कुरूड़ उठाकर लाया गया और सीधे तौर पर मंदिर से सबसे ऊंचे सिरे पर स्थापित किया गया । कुरूड़ लाने में सैंकड़ों लोगों द्वारा सहयोग दिया।  जनश्रुति के अनुसार जब  कुरुड को उठा लिया जाता है तो इसे भूमि पर नहीं रख जा सकता है ।  इसे मंदिर के शीर्ष पर ही  स्थापित करना होता है कुरुड़ स्थापना एक जटिल प्रक्रिया है लेकिन जहां इतनी देव आस्था और देवता का आशीर्वाद हो तो वहां असम्भव कार्य भी सम्भव हो जाता है। कुरूड़ को मंदिर का मुकुट माना जाता है ।कुरूड़ को  देवदार के समूचे विशाल वृक्ष से निर्मित किया जाता है । मुहूर्त देखकर पेड़ का पूजन किया जाता है तत्पश्चात इसका निर्माण आरम्भ किया जाता है। कुरूड़ स्थापित होने के उपरांत डोम देवता के गुर ने ेदेववाणी द्वारा मंदिर की छत पर से  लोगों को सफल आयोजन का चावल का दाना  आर्शिवाद के रूप में दिया गया । इस महायज्ञ में क्षेत्र के  करीब 15 मंदिरों के कारदार ने विशेष रूप से मौजूद रहे ।
बता दें कि डोम देवता का प्रमुख मंदिर शिमला जिला के गुठान में माना जाता है । जनश्रुति के अनुसार डोम देवता का इतिहास शिरगुल देवता की दिल्ली यात्रा से जुड़ा है अर्थात गुग्गा राणा और डोम देवता ने शिरगुल को दिल्ली में मुगलों की जेल से आजाद करवाने में अहम भूमिका निभाई थी ।

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